October 25, 2021

Sanatan Dharm

Satya Ka Marg

Amogh Shiv Kavach – अमोघ शिव कवचम्

3 min read
amogh shiv kavach

Amogh Shri Shiv Kavach

Amogh Shiv Kavach jise hum Shiv Amogh Kavach yaan Shiv kavach bhi kehte hain, yahan humne pehle Amogh Shri Shiv Kavach sanskrit mein aur fir uske baad me Amogh Shri Shiv Kavach hindi mein prastut kiya hai. Is prakar amogh shiv kavach lyrics arth sahit likha gaya hai.

(अमोग शिव कवच जिसे हम शिव अमोग कवच या शिव कवच भी कहते हैं। यहाँ हमनें पहले अमोग श्री शिव कवच संस्कृत में उसके बाद में हिन्दी में प्रस्तुत किया हे। इस प्रकार अमोघ शिव कवच अर्थ सहित लिखा गया है।)

Amogh Shiv Kavach Sanskrit Mein – अमोघ शिव कवच संस्कृत में

संस्कृत-साहित्य में कवच-रचना एक अद्भुत बात है। इष्टदेव को प्रसन्न करना और उन्हें अपनी रक्षा के लिये उद्यत करना कवच-स्तोत्रों का मुख्य उद्देश्य है। मुख्य-मुख्य देवताओं के कवच-स्तोत्र मिलते हैं जैसे नारायणकवच, देवीकवच तथा शिवकवच आदि।

कवच का अर्थ जिरावख्तर है। जैसे युद्ध में योद्धा कवच पहनकर शत्रु के सब प्रकार के प्रहारों से सुरक्षित रहता है, वैसे ही मनुष्य इन कवच-स्तोत्रों के पढ़ने और उनके मन्त्रों के जप करने से सब संकट-प्रहारों से इष्टदेव की कृपा द्वारा सुरक्षित हो जाता है और जिस विपत्ति में पड़ा हो उससे मुक्त हो जाता है।

यह अमोघ शिवकवच परम गोपनीय, अत्यन्त आदरणीय, सब पापों को दूर करनेवाला, सारे अमंगलों को, विघ्न-बाधाओं को हरनेवाला, परम पवित्र, जयप्रद और सम्पूर्ण विपत्तियों का नाशक माना गया है। यह परम हितकारी है और सब भयों को दूर करता है। इसके प्रभाव से क्षीणायु, मृत्यु के समीप पहुँचा हुआ महान् रोगी मनुष्य भी शीघ्र नीरोगता को प्राप्त करता है और उसकी दीर्घायु हो जाती है। अर्थाभाव से पीड़ित मनुष्य की सारी दरिद्रता दूर हो जाती है और उसको सुख-वैभव की प्राप्ति होती है। पापी महापातक से छूट जाता है और इसका भक्ति श्रद्धापूर्वक धारण करनेवाला निष्काम पुरुष देहान्त के बाद दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त होता है।

महर्षि ऋषभ ने इसका उपदेश करके एक संकटग्रस्त राजा को दुःखमुक्त किया था। यह कवच श्रीस्कन्दपुराण के ब्राह्म-खण्ड के ब्रह्मोत्तर-खण्ड (अध्याय 12/1-33) में पाया जाता है।

पहले विनियोग छोड़कर ऋष्यादिन्यास, करन्यास और हृदयादि अंगन्यास करके भगवान् शंकर का ध्यान करें। तदनन्तर कवच का पाठ करें।

Amogh Shiv Kavach Sanskrit Mein – अमोघ शिव कवचम् संस्कृत (प्रारम्भ)

Shiv Amogh Kavach
Shri Shiv Amogh Kavach Sanskrit

॥ विनियोगः ॥

अस्य श्री-शिव-कवच-स्तोत्र-मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीसदाशिव-रुद्रो देवता, ह्रीं शक्तिः, वं कीलकम्, श्रीं ह्रीं क्लीं बीजम्, सदाशिव-प्रीत्यर्थे शिवकवच-स्तोत्र-जपे विनियोगः ॥

॥ ऋष्यादिन्यासः ॥

ॐ ब्रह्मर्षये नमः, शिरसि।

अनुष्टुप् छन्दसे नमः, मुखे।

श्रीसदाशिव-रुद्रदेवतायै नमः, हृदि।

ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः।

वं कीलकाय नमः, नाभौ।

श्रीं ह्रीं क्लीमिति बीजाय नमः, गुह्ये।

विनियोगाय नमः, सर्वांगे।

॥ अथ करन्यासः ॥

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ ह्रीं रां सर्वशक्ति-धाम्ने ईशानात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ नं रीं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ मं रूं अनादि-शक्ति-धाम्ने अघोरात्मने मध्यमाभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ शिं रैं स्वतन्त्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने अनामिकाभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्योजातात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने कर-तल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।

॥ हृदयादि अंगन्यास ॥

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ ह्रीं रां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने हृदयाय नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ नं रीं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने शिरसे स्वाहा।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ मं रूं अनादि-शक्ति-धाम्ने अघोरात्मने शिखायै वषट्।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ शिं रैं स्वतन्त्र-शक्ति-धाम्ने वामदेवात्मने कवचाय हुम्।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो-जातात्मने नेत्र-त्रायाय वौषट्।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट्।

॥ अथ ध्यानम् ॥

वज्र-दंष्द्रं त्रिनयनं काल-कण्ठम-रिंदमम् ।
सहस्रकर-मप्युग्रं वन्दे शम्भुं-उमापतिम्

अथ कवचम्

॥ ऋषभ उवाच ॥

अथापरं सर्व-पुराण-गुह्यं निःशेष-पापौघ-हरं पवित्रम् ।
जयप्रदं सर्व-विपद्विमोचनं वक्ष्यामि शैवं कवचं हिताय ते

नमस्कृत्य महादेवं विश्व-व्यापिन-मीश्वरम् ।
वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्व-रक्षाकरं नृणाम् ॥1॥

शुचौ देशे समासीनो यथा-वत्कल्पिता-सनः।
जितेन्द्रियो जित-प्राणश्चिन्तयेच्-छिव-मव्ययम् ॥2॥

हृत्पुण्डरी-कान्तरसन्निविष्टं स्वतेजसा व्याप्तनभो-ऽवकाशम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्म-मनन्त-माद्यं ध्यायेत् परानन्द-मयं महेशम् ॥3॥

ध्याना-वधूताखिल-कर्म-बन्धश्-चिरं चिदानन्दनि-मग्नचेताः ।
षडक्षरन्यास-समाहित-आत्मा शैवेन कुर्यात् कवचेन रक्षाम् ॥4॥

॥ मूल कवच पाठ ॥

मां पातु देवो-ऽखिल-देवतात्मा संसारकूपे पतितं गभीरे ।
तन्नाम दिव्यं वरमन्त्र-मूलं धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम् ॥5॥

सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्तिर्-ज्योतिर्मयानन्द-घनश्चिदात्मा ।
अणो-रणी-या-नुरुशक्ति-रेकः स ईश्वरः पातु भयाद-शेषात् ॥6॥

यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं पायात् स भूमेर्गिरिशो-ऽष्टमूर्तिः ।
योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति संजीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥7॥

कल्पा-वसाने भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः ।
स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्नेर्-वात्यादि-भीतेर-खिलाच्च तापात् ॥8॥

प्रदीप्त-विद्युत्-कनकावभासो विद्या-वरा-भीति-कुठार-पाणिः ।
चतुर्मुखस्तत्पुरुष-स्त्रिनेत्रः प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम् ॥9॥

कुठार-वेदांकुश-पाशशूल-कपाल-ढक्काक्ष-गुणान् दधानः ।
चतुर्मुखो नील-रुचि-स्त्रिनेत्रः पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥10॥

कुन्देन्दुशंख-स्फटिका-वभासो वेदाक्षमाला-वरदाभयांकः ।
त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः सद्यो-ऽधिजातो-ऽवतु मां प्रतीच्याम् ॥11॥

वराक्षमाला-भयटंक-हस्तः सरोज-किञ्जल्क-समानवर्णः ।
त्रिलोचनश्चारु-चतुर्मुखो मां पाया-दुदीच्यां दिशि वामदेवः ॥12॥

वेदाभ्येष्टांकुश-पाश टंक-कपाल-ढक्काक्षक-शूलपाणि: ।
सितद्युति: पंचमुखो-ऽवतान्म-आमीशान ऊर्ध्वं परमप्रकाश: ॥13॥

मूर्द्धान-मव्यान् मम चंद्रमौलि: भालं ममाव्यादथ भालनेत्र: ।
नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्‍वनाथ: ॥14॥

पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्ति: कपोलमव्यात् सततं कपाली ।
वक्त्रं सदा रक्षतु पंचवक्त्रो जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्व: ॥15॥

कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठ: पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणि: ।
दोर्मूल-मव्यान्मम धर्मबाहुर्-वक्ष:स्थलं दक्ष-मखान्तकोऽव्यात् ॥16॥

ममोदरं पातु गिरींद्रधन्वा मध्यं ममाव्यान्-मदनांतकारी ।
हेरम्बतातो मम पातु नाभिं पायात्कटि धूर्जटिरीश्‍वरो मे ॥17॥

ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो जानुद्वयं मे जगदीश्‍वरो-ऽव्यात् ।
जंघायुगं पुंग-वकेतु-रव्यात् पादौ ममाव्यत् सुर-वंद्यपाद: ॥18॥

महेश्‍वर: पातु दिनादियामे मां मध्य-यामेऽवतु वामदेव:।
त्र्यम्बकः पातु तृतीय-यामे वृषध्वज: पातु दिनांत्य-यामे ॥19॥

पायान्नि-शादौ शशि-शेखरो-मां गंगाधरो रक्षतु मां निशीथे।
गौरीपति: पातु निशा-वसाने मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ॥20॥

अन्त: स्थितं रक्षतु शंकरो मां स्थाणु: सदा पातु बहि: स्थितम् माम् ।
तदंतरे पातु पति: पशूनां सदाशिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥21॥

तिष्ठन्त-मव्याद्‍-भुवनैक-नाथ: पायाद्‍ व्रजन्तं प्रमथाधिनाथ: ।
वेदांत-वेद्यो-ऽवतु मां निषण्णं मामव्यय: पातु शिव: शयानम् ॥22॥

मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्ठ: शैलादि-दुर्गेषु पुरत्रयारि: ।
अरण्य-वासादि-महाप्रवासे पायान्मृगव्याध उदारशक्ति: ॥23॥

कल्पांत-काटोप-पटुप्रकोपः स्फुटाट्-टहासोच्-चलिताण्डकोश: ।
घोरारि-सेनार्ण-वदुर्निवार-महाभयाद् रक्षतु वीरभद्र: ॥24॥

पत्त्यश्‍व-मातंग-घटा-वरूथ-सहस्र-लक्षायुत-कोटि-भीषणम् ।
अक्षौहिणीनां शत-मात-तायिनां छिंद्यान्मृडो घोर-कुठार-धारया ॥25॥

निहंतु दस्यून् प्रलयान-लार्चिर्-ज्वलत त्रिशूलं त्रिपुरांतकस्य ।
शार्दूल-सिंहर्क्ष-वृकादि-हिंस्रान् संत्रास-यत्वीशधनु: पिनाकं ॥26॥

दु:स्वप्न-दुश्शकुन-दुर्गति-दौर्मनस्य-दुर्भिक्ष-दुर्व्यसन-दुस्सह-दुर्यशांसि ।
उत्पात-ताप-विषभीतिमसद्‍-ग्रहार्ति व्याधींश्‍च नाशयतु मे जगतामधीश: ॥27॥

॥ मूल कवच समाप्त ॥

॥ मंत्र ॥

ॐ नमो भगवते सदाशिवाय सकल-तत्त्व-आत्मकाय सकल-तत्त्व-विहाराय सकल-लोकै-कर्त्रे सकल-लोकैक-भर्त्रे सकल-लोकैक-हर्त्रे सकल-लोकैक-गुरवे सकल-लोकैकसाक्षिणे सकल-निगम-गुह्याय सकल-वर-प्रदाय सकल-दुरि-तार्ति-भञ्जनाय सकल-जगद-भयंकराय सकल-लोकैक-शंकराय शशांक-शेखराय शाश्‍वत-निजावासाय निर्गुणाय निरूपमाय निरूपाय निरा-भासाय निरा-मयाय निष्प्रपञ्चाय निष्कलंकाय निर्द्वन्द्वाय निस्संगाय निर्मलाय निर्गमाय नित्य-रूप-विभवाय निरुपम-विभवाय निराधराय नित्य-शुद्ध-बुद्ध-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय परम-शान्त-प्रकाश-तेजो-रूपाय

जय जय महारुद्र महारौद्र भद्रावतार दुःखदावदारण महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपाल-मालाधर खट्वांग-खड्ग-चर्म-पाशांकुश-डमरु-शूल-चापबाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-तोमर-मुसल-मुद्गर-पट्टिश-परशु-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-चक्राद्य-आयुध-भीषणकर सहस्र-मुख दंष्ट्रा-कराल विकट-आट्टहास-विस्फारित-ब्रह्माण्ड-मण्डल-नागेन्द्र-कुण्डल नागेन्द्रहार नागेन्द्रवलय नागेन्द्रचर्मधर मृत्युञ्जय त्रयम्बक त्रिपुरान्तक विरूपाक्ष विश्वेश्वर विश्वरूप वृषभवाहन विषभूषण विश्वतोमुख सर्वतो रक्ष रक्ष मां ज्वल ज्वल महामृत्यु-भयमपमृत्यु-भयं नाशय नाशय रोग-भयम-उत्सादयोत्-सादय विष-सर्प-भयं शमय शमय चोरभयं मारय मारय

मम शत्रून-उच्चाटय-ओच्चाटय शूलेन विदारय विदारय कुठारेण भिन्धि भिन्धि खंगेन छिन्धि छिन्धि खट्वांगेन विपोथय विपोथय मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय बाणैः संताडय संताडय रक्षांसि भीषय भीषय भूतानि विद्रावय विद्रावय कूष्माण्ड-वेताल-मारीगण-ब्रह्मराक्षसान् संत्रासय संत्रासय ममाभयं कुरु कुरु वित्रस्तं माम-आश्वासय-आश्वासय नरक-भयान्मामुद्धारय संजीवय संजीवय क्षुत्तृड्भ्यां माम-आप्यायय-आप्यायय दुःखातुरं माम-आनन्दय-आनन्दय शिवकवचेन माम-आच्छादय-आच्छादय त्रयम्बक सदाशिव नमस्ते नमस्ते नमस्ते।

॥ ऋषभ उवाच ॥

इत्ये-तत्कवचं शैवं वरदं व्याहृतं मया ।
सर्व-बाधा-प्रशमनं रहस्यं सर्व-देहिनाम् ॥28॥

य: सदा धारयेन्मर्त्य: शैवं कवचमुत्तमम् ।
न तस्य जायते क्वापि भयं शंभो-रनु-ग्रहात् ॥29॥

क्षीणायुर्-मृत्यु-मापन्नो महारोग-हतोऽपि वा ।
सद्य: सुखम-वाप्नोति दीर्घ-मायुश्‍च विंदति ॥30॥

सर्व-दारिद्र्य शमनं सौमंगल्य-विवर्धनम् ।
यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते ॥31॥

महापातक-संघातैर्मुच्यते चोपपातकै: ।
देहांते शिव-माप्नोति शिव-वर्मानुभावत: ॥32॥

त्वमपि श्रद्धया वत्स शैवं कवचमुत्तमम् ।
धारयस्व मया दत्तं सद्य: श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥33॥

॥ सूत उवाच ॥

इत्युक्त्वा ऋषभो योगी तस्मै पार्थिवसूनवे ।
ददौ शंखं महारावं खड्गं चारि-निषूदनम् ॥34॥

पुनश्च भस्म संमंत्र्य तदंगं सर्वतोऽस्पृशत् ।
गजानां षट्सहस्रस्य द्विगुणं च बलं ददौ ॥35॥

भस्म-प्रभावात्संप्राप्य बलैश्वर्य-धृति-स्मृतीः ।
स राजपुत्रः शुशुभे शरदर्क इव श्रिया ॥36॥

तमाह प्रांजलिं भूयः स योगी राजनंदनम् ।
एष खड्गो मया दत्त-स्तपो-मंत्रानुभावतः ॥37॥

शितधारमिमं खड्गं यस्मै दर्शयसि स्फुटम् ।
स सद्यो म्रियते शत्रुः साक्षान्मृत्युरपि स्वयम् ॥38॥

अस्य शंखस्य निह्रादं ये शृण्वंति तवाहिताः ।
ते मूर्च्छिताः पतिष्यंति न्यस्त-शस्त्रा विचेतना ॥39॥

खड्ग-शंखाविमौ दिव्यौ परसैन्य-विनाशिनौ ।
आत्म-सैन्य-स्वपक्षाणां शौर्य-तेजो-विवर्धनौ ॥3.3.12.40॥

एतयोश्च प्रभावेन शैवेन कवचेन च ।
द्विषट्-सहस्त्र-नागानां बलेन महतापि च ॥41॥

भस्म-धारण-सामर्थ्याच्छ-त्रुसैन्यं विजेष्यसि ।
प्राप्य सिंहासनं पैत्र्यं गोप्तासि पृथिवी-मिमाम् ॥42॥

इति भद्रायुषं सम्यगनु-शास्य समातृकम् ।
ताभ्यां संपूजितः सोऽथ योगी स्वैर-गतिर्ययौ ॥43॥

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मोत्तर खंडे सीमंति-नीमाहात्म्ये भद्रायू-पाख्याने शिवकवच-कथनं नाम द्वादशो-ऽध्यायः ॥

Shri Amogh Shiv Kavach in Hindi
Shri Amogh Shiv Kavach in Hindi

Amogh Shiv Kavach Hindi Mein – अमोघ शिव कवच हिन्दी में

संस्कृत-साहित्य में कवच-रचना एक अद्भुत बात है। इष्टदेव को प्रसन्न करना और उन्हें अपनी रक्षा के लिये उद्यत करना कवच-स्तोत्रों का मुख्य उद्देश्य है। मुख्य-मुख्य देवताओं के कवच-स्तोत्र मिलते हैं जैसे नारायणकवच, देवीकवच तथा शिवकवच आदि।

कवच का अर्थ जिरावख्तर है। जैसे युद्ध में योद्धा कवच पहनकर शत्रु के सब प्रकार के प्रहारों से सुरक्षित रहता है, वैसे ही मनुष्य इन कवच-स्तोत्रों के पढ़ने और उनके मन्त्रों के जप करने से सब संकट-प्रहारों से इष्टदेव की कृपा द्वारा सुरक्षित हो जाता है और जिस विपत्ति में पड़ा हो उससे मुक्त हो जाता है।

यह अमोघ शिवकवच परम गोपनीय, अत्यन्त आदरणीय, सब पापों को दूर करनेवाला, सारे अमंगलों को, विघ्न-बाधाओं को हरनेवाला, परम पवित्र, जयप्रद और सम्पूर्ण विपत्तियों का नाशक माना गया है। यह परम हितकारी है और सब भयों को दूर करता है। इसके प्रभाव से क्षीणायु, मृत्यु के समीप पहुँचा हुआ महान् रोगी मनुष्य भी शीघ्र नीरोगता को प्राप्त करता है और उसकी दीर्घायु हो जाती है। अर्थाभाव से पीड़ित मनुष्य की सारी दरिद्रता दूर हो जाती है और उसको सुख-वैभव की प्राप्ति होती है। पापी महापातक से छूट जाता है और इसका भक्ति श्रद्धापूर्वक धारण करनेवाला निष्काम पुरुष देहान्त के बाद दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त होता है।

महर्षि ऋषभ ने इसका उपदेश करके एक संकटग्रस्त राजा को दुःखमुक्त किया था। यह कवच श्रीस्कन्दपुराण के ब्राह्म-खण्ड के ब्रह्मोत्तर-खण्ड (अध्याय 12/1-33) में पाया जाता है।

पहले विनियोग छोड़कर ऋष्यादिन्यास, करन्यास और हृदयादि अंगन्यास करके भगवान् शंकर का ध्यान करें। तदनन्तर कवच का पाठ करें।

Amogh Shiv Kavach Hindi Mein– अमोघ शिव कवच हिन्दी (प्रारम्भ)

॥ विनियोग ॥

अस्य श्रीशिव-कवच-स्तोत्र-मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीसदाशिव-रुद्रो देवता, ह्रीं शक्तिः, वं कीलकम्, श्रीं ह्रीं क्लीं बीजम्, सदाशिव-प्रीत्यर्थे शिवकवच-स्तोत्र-जपे विनियोगः।

॥ ऋष्यादिन्यासः ॥

ॐ ब्रह्मर्षये नमः, शिरसि।

अनुष्टुप् छन्दसे नमः, मुखे।

श्रीसदाशिव-रुद्रदेवतायै नमः, हृदि।

ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः।

वं कीलकाय नमः, नाभौ।

श्रीं ह्रीं क्लीमिति बीजाय नमः, गुह्ये।

विनियोगाय नमः, सर्वांगे।

॥ अथ करन्यास ॥

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ ह्रीं रां सर्वशक्ति-धाम्ने ईशानात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ नं रीं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ मं रूं अनादि-शक्ति-धाम्ने अघोरात्मने मध्यमाभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ शिं रैं स्वतन्त्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने अनामिकाभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्योजातात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने कर-तल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।

॥ हृदयादि अंगन्यास ॥

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ ह्रीं रां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने हृदयाय नमः।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ नं रीं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने शिरसे स्वाहा।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ मं रूं अनादि-शक्ति-धाम्ने अघोरात्मने शिखायै वषट्।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ शिं रैं स्वतन्त्र-शक्ति-धाम्ने वामदेवात्मने कवचाय हुम्।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो-जातात्मने नेत्र-त्रायाय वौषट्।

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट्।

॥ ध्यान ॥

जिनकी दाढ़ें वज्र के समान हैं, जो तीन नेत्र धरण करते हैं, जिनके कण्ठ में हलाहल-पान का नील चिह्न सुशोभित होता है, जो शत्रुभाव रखनेवालों का दमन करते हैं, जिनके सहस्रों कर (हाथ अथवा किरणें) हैं तथा जो अभक्तों के लिये अत्यन्त उग्र हैं, उन उमापति शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ।

अथ कवच

॥ ऋषभ जी कहते हैं ॥

जो सम्पूर्ण पुराणों में गोपनीय कहा गया है, समस्त पापों को हर लेनेवाला है, पवित्र, जयदायक तथा सम्पूर्ण विपत्तियों से छुटकारा दिलानेवाला है, उस सर्वश्रेष्ठ शिवकवच का मैं तुम्हारे हित के लिये उपदेश करूँगा। मैं विश्वव्यापी ईश्वर महादेवजी को नमस्कार करके मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाले इस शिवस्वरूप कवच का वर्णन करता हूँ ॥1॥

पवित्रा स्थान में यथायोग्य आसन बिछाकर बैठे। इन्द्रियों को अपने वश में करके प्राणायाम-पूर्वक अविनाशी भगवान् शिव जी का चिन्तन करें ॥2॥

परमानन्दमय भगवान महेश्वर हृदय-कमल के भीतर की कर्णिका में विराजमान हैं, उन्होंने अपने तेज से आकाश मण्डल को व्याप्त कर रखा है। वे इन्द्रियातीत, सूक्ष्म, अनन्त एवं सबके आदिकारण हैं।’ इस तरह उनका चिन्तन करे ॥3॥

इस प्रकार ध्यान के द्वारा समस्त कर्मबन्ध्न का नाश करके चिदानन्दमय भगवान् सदाशिव में अपने चित्त को चिरकाल तक लगाये रहे। फिर षडक्षरन्यास के द्वारा अपने मन को एकाग्र करके मनुष्य निम्नांकित शिवकवच के द्वारा अपनी रक्षा करें ॥4॥

॥ मूल कवच पाठ ॥

सर्वदेवमय महादेवजी गहरे संसार-कूप में गिरे हुए मुझ असहाय की रक्षा करें। उनका दिव्य नाम जो उनके श्रेष्ठ मन्त्रा का मूल है, मेरे हृदय स्थित समस्त पापों का नाश करे ॥5॥

सम्पूर्ण विश्व जिनकी मूर्ति है, जो ज्योतिर्मय आनन्दघनस्वरूप चिदात्मा हैं वे भगवान् शिव मेरी सर्वत्र रक्षा करें। जो सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं, महान् शक्ति से सम्पन्न हैं, वे अद्वितीय ‘ईश्वर’ महादेवजी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करें ॥6॥

जिन्होंने पृथ्वीरूप से इस विश्व को धारण कर रखा है, वे अष्टमूर्ति ‘गिरिश’ पृथ्वी से मेरी रक्षा करें। जो जलरूप से जीवों को जीवन-दान दे रहे हैं, वे ‘शिव’ जल से मेरी रक्षा करें ॥7॥

जो विशद लीलाविहारी ‘शिव’ कल्प के अन्त में समस्त भुवनों को दग्ध करके (आनन्द से) नृत्य करते हैं, वे ‘कालरुद्र’ भगवान् दावानल से, आँधी-तूफान के भय से और समस्त तापों से मेरी रक्षा करें ॥8॥

प्रदीप्त विद्युत् एवं स्वर्ण के सदृश जिनकी कान्ति है, विद्या, वर और अभय (मुद्राएँ) तथा कुल्हाड़ी जिनके कर-कमलों में सुशोभित हैं, चतुर्मुख त्रिलोचन हैं, वे भगवान् ‘तत्पुरुष’ पूर्व दिशा में निरन्तर मेरी रक्षा करें ॥9॥

जिन्होंने अपने हाथों में कुल्हाड़ी, वेद, अंकुश, फंदा, त्रिशूल, कपाल, डमरू और रुद्राक्ष की माला को धरण कर रखा है तथा जो चतुर्मुख हैं, वे नीलकान्ति त्रिनेत्राधरी भगवान् ‘अघोर’ दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें ॥10॥

कुन्द, चन्द्रमा, शंख और स्फटिक के समान जिनकी उज्ज्वल कान्ति है वेद, रुद्राक्षमाला, वरद और अभय (मुद्राओं) से जो सुशोभित हैं वे महाप्रभावशाली चतुरानन एवं त्रिलोचन भगवान् ‘सद्योजात’ पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें ॥11॥

जिनके हाथों में वर एवं अभय (मुद्राएँ), रुद्राक्षमाला और टाँकी विराजमान हैं तथा कमल किंजल्क के सदृश जिनका गौर वर्ण है, वे सुन्दर चार मुखवाले त्रिनेत्राधरी भगवान् ‘वामदेव’ उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें ॥12॥

जिनके कर-कमलों में वेद, अभय और वर (मुद्राएँ), अंकुश, टाँकी, फंदा, कपाल, डमरू, रुद्राक्षमाला और त्रिशूल सुशोभित हैं, जो श्वेत आभा से युक्त हैं, वे परम प्रकाशरूप पंचमुख भगवान् ‘ईशान’ मेरी ऊपर से रक्षा करें ॥13॥

भगवान् ‘चन्द्रमौलि’ मेरे सिर की, ‘भालनेत्र’ मेरे ललाट की, ‘भगनेत्राहारी’ मेरे नेत्रों की और ‘विश्वनाथ’ मेरी नासिका की सदा रक्षा करें ॥14॥

‘श्रुतिगीतकीर्ति’ मेरे कानों की, ‘कपाली’ निरन्तर मेरे कपोलों की, ‘पंचमुख’ मुख की तथा ‘वेदजिह्व’ जीभ की रक्षा करें ॥15॥

‘नीलकण्ठ’ महादेव मेरे गले की, ‘पिनाकपाणि’ मेरे दोनों हाथों की, ‘धर्मबाहु’ दोनों कंधों की तथा ‘दक्षयज्ञविध्वंसी’ मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करें ॥16॥

‘गिरीन्द्रधन्वा’ मेरे पेट की, ‘कामदेव के नाशक’ मध्यदेश की, ‘गणेशजी के पिता’ मेरी नाभि की तथा ‘धूर्जटि’ मेरी कटि की रक्षा करें ॥17॥

‘कुबेरमित्र’ मेरी दोनों जाँघों की, ‘जगदीश्वर’ दोनों घुटनों की, ‘पुंगवकेतु’ दोनों पिंडलियों की और ‘सुरवन्द्यचरण’ मेरे पैरों की सदैव रक्षा करें ॥18॥

‘महेश्वर’ दिन के पहले पहर में मेरी रक्षा करें। ‘वामदेव’ मध्य पहर में मेरी रक्षा करें। ‘त्रयम्बक’ तीसरे पहर में और ‘वृषभध्वज’ दिन के अन्तवाले पहर में मेरी रक्षा करें ॥19॥

‘शशिशेखर’ रात्रि के आरम्भ में, ‘गंगाधर’ अर्धरात्रि में, ‘गौरीपति’ रात्रि के अन्त में और ‘मृत्युंजय’ सर्वकाल में मेरी रक्षा करें ॥20॥

‘शंकर’ घर के भीतर रहने पर मेरी रक्षा करें। ‘स्थाणु’ बाहर रहने पर मेरी रक्षा करें। ‘पशुपति’ बीच में मेरी रक्षा करें और ‘सदाशिव’ सब ओर मेरी रक्षा करें ॥21॥

‘भुवनैकनाथ’ खड़े होने के समय, ‘प्रमथनाथ’ चलते समय, ‘वेदान्तवेद्य’ बैठे रहने के समय और ‘अविनाशी शिव’ सोते समय मेरी रक्षा करें ॥22॥

‘नीलकण्ठ’ रास्ते में मेरी रक्षा करें। ‘त्रिपुरारि’ शैलादि दुर्गों में और उदारशक्ति ‘मृगव्याध’ वनवासादि महान् प्रवासों में मेरी रक्षा करें ॥23॥

जिनका प्रबल क्रोध कल्पों का अन्त करने में अत्यन्त पटु है, जिनके प्रचण्ड अट्टहास से ब्रह्माण्ड काँप उठता है, वे ‘वीरभद्रजी’ समुद्र के सदृश भयानक शत्रुसेना के दुर्निवार महान् भय से मेरी रक्षा करें ॥24॥

भगवान् ‘मृड’ मुझ पर आततायीरूप से आक्रमण करने वालों की हजारों, दस हजारों, लाखों और करोड़ों पैदलों, घोड़ों और हाथियों से युक्त अति भीषण सैकड़ों अक्षौहिणी सेनाओं का अपनी घोर कुठारधर से भेदन करें ॥25॥

भगवान् ‘त्रिपुरान्तक’ का प्रलयाग्नि के समान ज्वालाओं से युक्त जलता हुआ त्रिशूल मेरे दस्युदल का विनाश कर दे और उनका पिनाक धनुष चीता, सिंह, रीछ, भेड़िया आदि हिंस्र जन्तुओं को संत्रस्त करे ॥26॥

वे जगदीश्वर मेरे बुरे स्वप्न, बुरे शकुन, बुरी गति, मन की दुष्ट भावना, दुर्भिक्ष, दुर्व्यसन, दुस्सह अपयश, उत्पात, संताप, विषभय, दुष्ट ग्रहों की पीड़ा तथा समस्त रोगों का नाश करें ॥27॥

॥ मूल कवच समाप्त ॥

॥ मंत्र ॥

ॐ जिनका वाचक है, सम्पूर्ण तत्त्व जिनके स्वरूप हैं, जो सम्पूर्ण तत्त्वों में विचरण करनेवाले, समस्त लोकों के एकमात्र कर्ता और सम्पूर्ण विश्व के एकमात्र भरण-पोषण करनेवाले हैं, जो अखिल विश्व के एक ही संहारकारी, सब लोकों के एकमात्र गुरु, समस्त संसार के एक ही साक्षी, सम्पूर्ण वेदों के गूढ़ तत्त्व, सबको वर देनेवाले, समस्त पापों और पीड़ाओं का नाश करनेवाले, सारे संसार को अभय देनेवाले, सब लोकों के एकमात्र कल्याणकारी, चन्द्रमा का मुकुट धारण करने वाले, अपने सनातन-प्रकाश से प्रकाशित होनेवाले, निर्गुण, उपमारहित, निराकार, निराभास, निरामय, निष्प्रपंच, निष्कलंक, निर्द्वन्द्व, निस्संग, निर्मल, गति-शून्य, नित्यरूप, नित्य-वैभव से सम्पन्न, अनुपम ऐश्वर्य से सुशोभित, आधारशून्य, नित्य-शुद्ध-बुद्ध, परिपूर्ण, सच्चिदानन्दघन, अद्वितीय तथा परम शान्त, प्रकाशमय, तेजःस्वरूप हैं, उन भगवान् सदाशिव को नमस्कार है।

हे महारुद्र, महारौद्र, भद्रावतार, दुःख-दावाग्नि-विदारण, महाभैरव, कालभैरव, कल्पान्तभैरव, कपालमालाधारी! हे खट्वांग, खड्ग, ढाल, फंदा, अंकुश, डमरू, त्रिशूल, धनुष, बाण, गदा, शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर, मुसल, मुद्गर, पट्टिश, परशु, परिघ, भुशुण्डी, शतघ्नी और चक्र आदि आयुधों के द्वारा भयंकर हाथोंवाले! हजार मुख और दंष्ट्रों से कराल, विकट अट्टहास से विशाल ब्रह्माण्ड-मण्डल का विस्तार करनेवाले, नागेन्द्र वासुकि को कुण्डल, हार, कंकण तथा ढाल के रूप में धारण करने वाले, मृत्युंजय, त्रिनेत्र, त्रिपुरनाशक, भयंकर नेत्रोंवाले, विश्वेश्वर, विश्वरूप में प्रकट, बैल पर सवारी करनेवाले, विष को गले में भूषणरूप में धारण करनेवाले तथा सब ओर मुखवाले भगवाल शंकर! आपकी जय हो, जय हो! आप मेरी सब ओर से रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। प्रज्वलित होइये, प्रज्वलित होइये। मेरे महामृत्यु-भय का तथा अपमृत्यु के भय का नाश कीजिये, नाश कीजिये। (बाहरी और भीतरी) रोग-भय को जड़ से मिटा दीजिये, जड़ से मिटा दीजिये। विष और सर्प के भय को शान्त कीजिये, शान्त कीजिये। चोरभय को मार डालिये, मार डालिये।

मेरे (काम-क्रोध-लोभादि भीतरी तथा इन्द्रियों के और शरीर के द्वारा होनेवाले पापकर्मरूपी बाहरी) शत्राुओं का उच्चाटन कीजिये, उच्चाटन कीजिये, त्रिशूल के द्वारा विदारण कीजिये, विदारण कीजिये कुठार के द्वारा काट डालिये, काट डालिये खड्ग के द्वारा छेद डालिये, छेद डालिये खट्वांग के द्वारा नाश कीजिये, नाश कीजिये मुसल के द्वारा पीस डालिये, पीस डालिये और बाणों के द्वारा बींध डालिये, बींध डालिये। (आप मेरी हिंसा करनेवाले) राक्षसों को भय दिखाइये, भय दिखाइये। भूतों को भगा दीजिये, भगा दीजिये। कूष्माण्ड, वेताल, मारियों और ब्रह्मराक्षसों को संत्रस्त कीजिये, संत्रस्त कीजिये। मुझको अभय दीजिये, अभय दीजिये। मुझ अत्यन्त डरे हुए को आश्वासन दीजिये, आश्वासन दीजिये। नरक-भय से मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये। मुझे जीवन-दान दीजिये, जीवन-दान दीजिये। क्षुधा-तृषा का निवारण करके मुझको आप्यायित कीजिये, आप्यायित कीजिये। आपकी जय हो, जय हो। मुझ दुःखातुर को आनन्दित कीजिये, आनन्दित कीजिये। शिवकवच से मुझे आच्छादित कीजिये, आच्छादित कीजिये। त्रयम्बक सदाशिव! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।

॥ ऋषभ जी कहते हैं ॥

इस प्रकार यह वरदायक शिवकवच मैंने कहा है। यह सम्पूर्ण बाधाओं को शान्त करनेवाला तथा समस्त देहधारियों के लिये गोपनीय रहस्य हैं ॥28॥

जो मनुष्य इस उत्तम शिवकवच को सदा धारण करता है, उसे भगवान् शिव के अनुग्रह से कभी और कहीं भी भय नहीं होता ॥29॥

जिसकी आयु क्षीण हो चली है, जो मरणासन्न हो गया है अथवा जिसे महान् रोगों ने मृतक-सा कर दिया है, वह भी इस कवच के प्रभाव से तत्काल सुखी हो जाता और दीर्घायु प्राप्त कर लेता है ॥30॥

शिवकवच समस्त दरिद्रता का शमन करनेवाला और सौमंगल्य को बढ़ाने वाला है, जो इसे धरण करता है, वह देवताओं से भी पूजित होता है ॥31॥

इस शिवकवच के प्रभाव से मनुष्य महापातकों के समूहों और उपपातकों से भी छुटकारा पा जाता है तथा शरीर का अन्त होने पर भगवान शिव को पा लेता है ॥32॥

वत्स! तुम भी मेरे दिये हुए इस उत्तम शिवकवच को श्रद्धापूर्वक धारण करो, इससे तुम शीघ्र और निश्चय ही कल्याण के भागी होओगे ॥33॥

Leave a Reply